जब कोई विचार एक बीज के रूप में बोया जाता है और सौ वर्ष तक करोड़ों लोगों के समर्पण से सींचा जाता है, तो वह केवल एक संगठन नहीं, बल्कि एक जीवन्त परंपरा बन जाता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की 2025 में पूर्ण होने वाली शताब्दी यात्रा भी एक गाथा है तपस्या और राष्ट्र-उत्कर्ष की एक अनवरत यात्रा। 1925-1940 बीसवीं सदी का प्रारम्भ दशकों तक भारत के लिए गिरावट और आत्मविश्वास खोने का समय था। तत्कालीन स्वतंत्रता आंदोलन के उतार-चढ़ाव और समाज में व्याप्त अनुशासनहीनता को देखकर नागपुर के द्रष्टा चिकित्सक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने अनुभव किया कि केवल राजनीतिक स्वतंत्रता ही पर्याप्त नहीं है। असली आवश्यकता राष्ट्र की सोई हुई आत्मा को जगाने और एक संगठित समाज का निर्माण करने की थी। विचार का विस्तार – श्री गुरुजी गोलवलकर का युग (1940–1973) 1940 में डॉ. हेडगेवार के देहावसान के पश्चात, श्री माधवसदाशिव गोलवलकर ‘श्री गुरुजी’ ने सरसंघचालक का दायित्व संभाला। यदि डॉक्टर साहब संघ के शरीर-निर्माता थे, तो श्री गुरुजी आत्मा-संवर्धक थे। गुरुजी ने संगठन को 33 वर्षों तक अखिल राष्ट्रीय प्रवाह बनाने के लिए कार्य किया और समाज के सभी क्षेत्रों में शाखाओं का विस्तार किया। 1948 में संघ पर लगे प्रतिबंध और उसके पहली बार प्रत्यक्ष रूप से दी गई चुनौती उनके नेतृत्व में संघ की पहली बड़ी परीक्षा थी, जिसमें संघ तपकर और मजबूत होकर निकला। सामाजिक समरसता और सेवा का शंखनाद – बालासाहेब देवरस का युग (1973–1994) गुरुजी के बाद बालासाहेब देवरस तीसरे सरसंघचालक बने। उन्होंने सामाजिक समरसता और सेवा के क्षेत्र में सक्रियता पर विशेष जोर दिया। आपातकाल (1975) की कठिन परिस्थिति में हजारों स्वयंसेवकों ने जेल यातनाएँ सही। देवरस जी ने समाज के विविध वर्गों के साथ संवाद का सेतु बनाया और सामाजिक न्याय, दलित उत्थान और पिछड़े वर्गों में संघ की स्वीकृति बढ़ाई। आधुनिक युग का संघ – संवाद, समन्वय और समावेशिता कुप. रा. मोहन भागवत और के. एस. सुदर्शन के नेतृत्व में संघ ने 21वीं सदी की चुनौतियों का स्वागत करने की तैयारी की। सेवा प्रकल्पों का विस्तार हुआ। राष्ट्र-निर्माण की कर्मभूमि: अनुषांगिक संगठनों का ताना-बाना संघ का प्रभाव केवल शाखाओं तक सीमित नहीं रहा। संघ प्रेरणा से अनेक अनुषांगिक संगठन खड़े हुए— शिक्षा, श्रमिक, किसान, छात्र, महिला, जनजाति, अर्थ और सेवा के क्षेत्र में। शताब्दी से अनंत तक: भविष्य का आभास संघ की यात्रा केवल एक पड़ाव है, मंजिल नहीं। शताब्दी का दृष्टिकोण और भी विराट और रचनात्मक है। हर व्यक्ति अनुशासन, स्वावलम्बन और राष्ट्र के प्रति समर्पित हो— यही भविष्य का मूल मंत्र है। संघ का लक्ष्य केवल एक मजबूत संगठन बनाना नहीं, बल्कि एक ऐसा सशक्त और अजेय समाज खड़ा करना है, जो भारत को ‘परम वैभव’ के शिखर पर पुनः प्रतिष्ठित कर सके। आने वाली पीढ़ियाँ इस वृक्ष को और भी विशाल बनाएंगी। Post navigation Ujjain doctor’s controversial hospital sealed after baby’s death in womb:Family accused practitioner of negligence, leading the health official to order inquiry Amit Shah commended CM Vishnu Deo Sai For Determined Efforts In Combating Maoism In CG